अडानी-अंबानी और प्रधानमंत्री को गाली देने से कांग्रेस की दाल नहीं गलेगी

अडानी-अंबानी और प्रधानमंत्री को गाली देने से कांग्रेस का भला होने वाला नहीं है
कांग्रेस की समस्या स्वयं कांग्रेस है। कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि केवल अडानी-अंबानी या प्रधानमंत्री को गाली देने से उसका भला होने वाला नहीं है। कांग्रेस को देश में सत्ता हासिल करनी है, तो उसे देश की जनता का विश्वास जीतना पड़ेगा। एक ओर कांग्रेस देश में सत्ता चाहती है, दूसरी ओर उसकी राजनीति में ऐसे बयान और विचार दिखाई देते हैं, जो देश की सांस्कृतिक पहचान और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं के विरुद्ध माने जाते हैं। कांग्रेस को यह समझना होगा कि सनातन भारत की पहचान को नजरअंदाज करके और तुष्टीकरण की राजनीति के आरोपों से घिरकर वह देश की सत्ता हासिल नहीं कर सकती।
अडानी-अंबानी जैसे उद्योगपति देश की आर्थिक समृद्धि में अपना योगदान देते हैं। राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं। यह बात अलग है कि जिस राजनीतिक दल की सरकार से उनके कारोबारी हित अधिक जुड़े होंगे, उसे अधिक चंदा मिलने की संभावना भी रहेगी। जब केंद्र और अनेक राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, तो उद्योगपतियों का काम भी स्वाभाविक रूप से इन्हीं सरकारों से पड़ेगा। ऐसे में व्यावहारिक रूप से भाजपा को अधिक राजनीतिक चंदा मिलना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है।
अब अगर कांग्रेस को स्वयं को भाजपा की जगह स्थापित करना है, तो इसके लिए उसे देश की जनता का जनादेश हासिल करना पड़ेगा। अडानी-अंबानी को गाली देने या प्रधानमंत्री के माता-पिता को लेकर अभद्र टिप्पणी करने से कोई फायदा होने वाला नहीं है। उल्टा, ऐसी राजनीति भाजपा को कांग्रेस के विरुद्ध जनता के बीच अपनी बात रखने का अवसर देती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से चुनाव लड़ते हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि गुजरात से है। कांग्रेस को इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की सबसे अधिक सीटें मतलब वोट हैं और गुजरात देश के प्रमुख औद्योगिक तथा व्यापारिक केंद्रों में से एक होने के कारण यहां अधिक नोट हैं। उत्तर प्रदेश के वोट और गुजरात की नोट, दोनों राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केंद्र में सरकार बनाने के लिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में जनसमर्थन और देश की आर्थिक परिस्थितियों की समझ, दोनों की आवश्यकता है।
कांग्रेस को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि देश में जब तक नेहरू-गांधी की राजनीतिक प्रभावी रही, तब तक उत्तर प्रदेश और गुजरात की अपनी-अपनी भूमिका रही। नेहरू उत्तर प्रदेश के वोट और गांधी गुजरात के नोट का प्रतीक रहे हैं। आज राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं। अडानी-अंबानी जैसे उद्योगपति आर्थिक विमर्श के केंद्र में हैं और नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता का प्रमुख चेहरा हैं। कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि केंद्रीय सत्ता का चुनाव कोई पार्षदी का चुनाव नहीं है कि गाली देने से ही काम बन जाए।
कांग्रेस को गाली-गलौज के बजाय तुष्टीकरण के आरोपों से बाहर निकलने, उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार मजबूत करने और देश के आर्थिक केंद्रों के साथ बेहतर संबंध बनाने पर काम करना पड़ेगा। वैसे भी भारत की जनता अहंकार को पसंद नहीं करती और गाली-गलौज की राजनीति को भी पसंद नहीं करती। जितनी ज्यादा व्यक्तिगत अभद्रता होगी, उतना ही राजनीतिक विरोधियों को उसका लाभ उठाने का अवसर मिलेगा।
कांग्रेस ने अपने राजनीतिक विरोधियों के अनुसार अपनी छवि सनातन विरोधी, हिंदू विरोधी और तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली पार्टी के रूप में बनने दी है। कांग्रेस इन आरोपों को स्वीकार करे या न करे, लेकिन उसे यह समझना होगा कि उसकी छवि का असर चुनावों पर पड़ता है। यदि उसकी बची हुई साख भी व्यक्तिगत हमलों और अभद्र भाषा के कारण कमजोर होती है, तो इसका नुकसान उसी को उठाना पड़ेगा।
पहले नेहरू के समय कांग्रेस को गुजरात के व्यापारिक वर्ग का समर्थन मिलता था। आज कांग्रेस को लगता है कि हर जगह गुजराती ही गुजराती हैं। उसे यह समझना चाहिए कि गुजरात के व्यापारियों और उद्योगपतियों का प्रभाव केवल गुजरात तक सीमित नहीं है। देश के कोने-कोने से लोग गुजरात में काम करने जाते हैं। गुजराती व्यापारियों ने देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापार और उद्योग के विस्तार में योगदान दिया है। गुजरात की अनेक कंपनियां भी देश की आर्थिक तरक्की में अपनी भूमिका निभा रही हैं।
विदेशी कंपनियां यदि भारतीय कंपनियों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करें, तो उसका विरोध समझ में आता है। लेकिन यदि देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी ही भारतीय कंपनियों के विरुद्ध ऐसा माहौल बनाने लगे, जिससे देश के उद्योग जगत को नुकसान पहुंचने की आशंका पैदा हो, तो इससे उसकी छवि अच्छी बनने वाली नहीं है। हालांकि, देश की किसी कंपनी के विरुद्ध भ्रष्टाचार या अनियमितता के प्रमाण हों, तो उसकी जांच और आलोचना करना भी आवश्यक है। देशभक्ति का अर्थ किसी कंपनी को सवालों से ऊपर रखना नहीं, बल्कि देश के हितों की रक्षा करना है लेकिन विदेशियों के हित पर नहीं।
कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि देश की सत्ता में दोबारा आने के लिए उसे बहुसंख्य समाज के बड़े हिस्से का विश्वास जीतना पड़ेगा। केवल एक समुदाय विशेष के समर्थन से राष्ट्रीय राजनीति में सफलता हासिल करना कठिन है। किसी एक समुदाय को प्रसन्न करने के प्रयास में यदि दूसरे समुदायों के बीच अविश्वास पैदा होता है, तो इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ता है। देश के सभी समुदायों के साथ न्याय करना और सबका विश्वास जीतना ही किसी राष्ट्रीय पार्टी की सफलता का आधार हो सकता है।
विदेशी शक्तियों के अपने हित होते हैं। वे अपने हितों के अनुसार निर्णय लेती हैं। इसलिए भारत के राजनीतिक दलों को भी देश के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। देश की कंपनियों, उद्योगपतियों और संस्थाओं की आलोचना करते समय भी तथ्यों और प्रमाणों का सहारा लेना चाहिए।
कहावत है कि गांव से बड़ी बारात नहीं होती। इसका अर्थ यही है कि व्यापक जनसमर्थन के बिना कोई भी राजनीतिक दल राष्ट्रीय सत्ता हासिल नहीं कर सकता। देश के उद्योगपतियों, सनातनियों और दूसरे सामाजिक वर्गों को गाली देने, संस्थाओं पर अविश्वास जताने तथा उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के बजाय कांग्रेस को अपने तर्कों और प्रमाणों से जनता को अपने पक्ष में करना चाहिए।
यह अलग बात है कि यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल देश को अराजक स्थिति में धकेलकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं, तो यह उनका राजनीतिक रास्ता है। लेकिन देश की जनता उनके इरादों को किस नजरिये से देखती है और चुनावों में क्या फैसला देती है, यह समय ही निर्धारित करता है।
कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि भारत को भारत की नजरों से देखे बिना और भारत को भारत की जनता की समझ से समझे बिना किसी भी राजनीतिक दल का भला होने वाला नहीं है। देश की जनता की भावनाओं, उसकी सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक आवश्यकताओं और राजनीतिक अपेक्षाओं को समझना जरूरी है।
गाली-गलौज से नहीं, विनम्रता से काम चलेगा। अकड़ से नहीं, जनविश्वास से सत्ता मिलेगी। केवल भाजपा का विरोध करने से नहीं, बल्कि जनता के सामने एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में कांग्रेस को खड़ा होना पड़ेगा।
31 अक्टूबर 2026
अजय नारायण त्रिपाठी “अलखू”