एक तरफ मेडिकल टूरिज्म, दूसरी तरफ टूटी व्हीलचेयर

एक तरफ मेडिकल टूरिज्म, दूसरी तरफ टूटी व्हीलचेयर
भारत आज दुनिया के प्रमुख मेडिकल टूरिज्म गंतव्यों में तेजी से उभर रहा है। एक समाचार के अनुसार, वर्ष 2009 में लगभग 1.12 लाख विदेशी मरीज इलाज के लिए भारत आए थे, जबकि 2025 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 5.07 लाख हो गई। अनुमान है कि 2030 तक भारत का मेडिकल टूरिज्म बाजार ₹1.56 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। भारत 172 देशों के नागरिकों को ई-मेडिकल वीजा तथा उनके सहायकों के लिए ई-मेडिकल अटेंडेंट वीजा उपलब्ध करा रहा है। आयुर्वेद, योग, यूनानी और होम्योपैथी जैसी भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के लिए अलग AYUSH वीजा की व्यवस्था भी की गई है। ‘हील इन इंडिया’ पोर्टल के माध्यम से विदेशी मरीजों को एकीकृत सेवाएं देने का प्रयास किया जा रहा है।
भारत में इलाज अपेक्षाकृत कम खर्चीला है। विशेषज्ञ डॉक्टर जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं, जांच रिपोर्ट कम समय में मिल जाती है और कई अस्पताल इलाज का अनुमानित खर्च पहले ही बता देते हैं। यही कारण है कि बांग्लादेश, इराक, उज्बेकिस्तान, सोमालिया, ओमान, केन्या सहित अनेक देशों के मरीज बड़ी संख्या में भारत का रुख कर रहे हैं। ब्रिटेन जैसे देशों में जहां किसी विशेषज्ञ से मिलने के लिए महीनों या एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ सकता है, वहीं भारत में कई मामलों में अगले ही दिन परामर्श और जांच संभव हो जाती है।
लेकिन इस चमकदार तस्वीर का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
देश के अनेक सरकारी अस्पतालों में आज भी मरीजों को टूटी हुई व्हीलचेयर, खराब स्ट्रेचर, जर्जर बेड, गंदे शौचालय, पानी का रिसाव, खराब एसी, दवाओं की कमी और भारी भीड़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार मरीजों को स्ट्रेचर न मिलने पर परिजन कंधों पर उठाकर ले जाते दिखाई देते हैं। अस्पतालों के गलियारों और फर्श पर मरीजों का इलाज होना भी असामान्य दृश्य नहीं रह गया है।
दूसरी ओर, निजी अस्पतालों में आधुनिक सुविधाएं तो उपलब्ध हैं, लेकिन इलाज का खर्च आम नागरिक के लिए कई बार अत्यधिक बोझ बन जाता है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी, स्थायी नियुक्तियों का अभाव, बढ़ती मरीज संख्या तथा कमजोर प्रबंधन व्यवस्था भी गंभीर चुनौतियां हैं।
यह भी विचार करने योग्य है कि भारत में आने वाले अधिकांश विदेशी मरीज ऐसे देशों से हैं, जिनकी स्वास्थ्य व्यवस्था भारत से भी कमजोर या सीमित संसाधनों वाली है। इसलिए केवल विदेशी मरीजों की बढ़ती संख्या को विश्वस्तरीय स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा। वास्तविक कसौटी यह है कि क्या भारत अपने ही नागरिकों को सम्मानजनक, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा पा रहा है।
69364 हास्पिटल जिसमें 43486 निजी तथा 25778 सरकारी के साथ भारत के पास विशाल स्वास्थ्य ढांचा है जिसमें रोज वृद्धि हो रही है और यह निश्चित रूप से गर्व का विषय है कि देश चिकित्सा क्षेत्र में वैश्विक पहचान बना रहा है। लेकिन केवल मेडिकल टूरिज्म की सफलता से संतुष्ट होने के बजाय हमें सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने पर समान रूप से ध्यान देना होगा हमारे गांव आज भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं जबकि देश की सबसे बड़ी आबादी गावों मे ही रहती है। बेहतर अस्पताल, पर्याप्त डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ, आधुनिक एंबुलेंस, पर्याप्त व्हीलचेयर और स्ट्रेचर, स्वच्छ परिसर तथा विश्वस्तरीय बुनियादी सुविधाएं ही भारत को वास्तव में स्वास्थ्य महाशक्ति बना सकती हैं।
भारत को अपनी उपलब्धियों पर गर्व अवश्य करना चाहिए, लेकिन आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिए। जब तक देश का सामान्य नागरिक सरकारी अस्पताल में सम्मानपूर्वक, समय पर और गुणवत्तापूर्ण इलाज प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की यात्रा अधूरी रहेगी। मेडिकल टूरिज्म की सफलता तभी सार्थक होगी, जब उसका लाभ भारत के हर नागरिक तक समान रूप से पहुंचे।
29 जुलाई 2026
अजय नारायण त्रिपाठी “ अलखू “