सरकारों का भ्रम और नशामुक्ति अभियान

सरकारों का भ्रम और नशामुक्ति अभियान

हर वर्ष 26 जून को अंतरराष्ट्रीय नशा एवं अवैध तस्करी निरोध दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर सरकारें, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन नशामुक्ति का संदेश देते हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल भाषण, पोस्टर और फोटो खिंचवाने भर से समाज नशामुक्त हो सकता है?
विडंबना तब और बढ़ जाती है जब नशामुक्ति का संदेश देने वालों की व्यक्तिगत छवि ही सवालों के घेरे में हो। यदि किसी जनप्रतिनिधि या सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के बारे में समाज में यह धारणा बन चुकी हो कि वह स्वयं नशे का सेवन करता है, तो उसके द्वारा नशामुक्ति का संदेश जनता पर प्रभाव नहीं छोड़ता। ऐसे अभियानों पर लोग गंभीर होने के बजाय व्यंग्य करते हैं।
नशामुक्ति के नाम पर कई बार केवल दिखावा भी देखने को मिलता है। कहीं शराब की बोतलें खरीदकर सार्वजनिक रूप से तोड़ी जाती हैं, कहीं फोटो और वीडियो बनाकर प्रचार किया जाता है। प्रश्न यह है कि जिन बोतलों को नष्ट किया गया, वे पहले खरीदी तो गईं। इससे शराब का व्यापार तो हुआ ही। यदि वही धन नशे के शिकार लोगों के उपचार, पुनर्वास या जागरूकता पर खर्च किया जाता तो उसका समाज को कहीं अधिक लाभ मिलता।
नशे का कारोबार केवल तस्करों के भरोसे नहीं चलता। वैध शराब की बिक्री सरकार की नीतियों के अंतर्गत होती है, जबकि अवैध नशे के कारोबार पर नियंत्रण प्रशासन और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी है। जब कहीं बड़ी कार्रवाई होती है, तो उसके पीछे अक्सर किसी ईमानदार अधिकारी की सक्रियता या आपसी विवाद जैसी परिस्थितियाँ भी कारण बनती हैं।
एक ओर सरकारें राजस्व बढ़ाने के लिए शराब की बिक्री की व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक बनाती हैं, दूसरी ओर नशामुक्ति अभियान भी चलाती हैं। यही विरोधाभास लोगों के मन में प्रश्न खड़े करता है। यदि लक्ष्य वास्तव में नशामुक्त समाज है, तो केवल प्रचार नहीं, बल्कि ऐसी नीतियाँ भी आवश्यक हैं जो नशे की उपलब्धता और उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को कम करें।
नशे का सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है। आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है, परिवार टूटते हैं, स्वास्थ्य बिगड़ता है और अपराध तथा घरेलू हिंसा जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। अंततः इन सबका बोझ भी सरकार और समाज को ही उठाना पड़ता है। इसलिए केवल राजस्व के आधार पर नशे को लाभकारी मानना दूरदर्शी सोच नहीं कही जा सकती।
विशेष चिंता का विषय मेडिकल नशा और नशीले पदार्थों का बढ़ता दुरुपयोग है। युवाओं में इसकी लत शारीरिक, मानसिक और सामाजिक जीवन को बर्बाद कर सकती है। इसलिए रोकथाम, उपचार और पुनर्वास पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
नशामुक्ति अभियान तभी प्रभावी होगा जब उसका नेतृत्व ऐसे लोग करें जिनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न न हो। समाज को प्रेरणा उपदेशों से कम और उदाहरणों से अधिक मिलती है। कथनी और करनी में अंतर अभियान की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
आज सोशल मीडिया के युग में जनता सब देखती है। इसलिए सरकारों और जनप्रतिनिधियों को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि केवल विज्ञापन और समारोहों से वास्तविकता छिप जाएगी। यदि नशामुक्त भारत का लक्ष्य सचमुच हासिल करना है, तो दिखावे के बजाय ईमानदार नीति, प्रभावी कानून, जनजागरूकता और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता होगी। तभी नशामुक्ति अभियान एक औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकेगा।

27 जून 2026

अजय नारायण त्रिपाठी “ अलखू ”

 

Facebook Comments Box

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *