हठ छोड़कर शेरों को गुजरात से बाहर भी बसाना चाहिए
हठ छोड़कर शेरों को गुजरात से बाहर भी बसाना चाहिए

भारत में शेर केवल गुजरात के गिर में है आज इनकी संख्या बढ़ी है और गुजरात सरकार गुजरात में ही इन्हें अन्य जगहों पर बसाने के लिए काम कर रही है।
आज एशियाई शेर केवल इसी क्षेत्र के आसपास पाए जाते हैं यह गुजरात और भारत दोनों के लिए गर्व की बात है क्योंकि एक ऐसा समय भी था कि एशियाई शेरों का अस्तित्व ही समाप्ति पर आ गया था तब इसी क्षेत्र में उन्हें बचाया लेकिन आज सोचने की बात है कि क्या किसी पूरी प्रजाति का भविष्य केवल एक ही राज्य और एक ही क्षेत्र पर निर्भर रहना चाहिए।
वन्य जीव विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि यदि किसी महामारी, प्राकृतिक आपदा, जहरीले संक्रमण या अनुवांशिक संकट जैसी घटना ने गिर शेरों की आबादी को प्रभावित कर दिया तो पूरी प्रजाति खतरे में पड़ सकती। ग्वालियर महाराज माधवराव सिंधिया प्रथम ने 1904 के आसपास अपने राज्य में शेरों को पुनः बसाने का प्रयास किया था ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन के प्रोत्साहन पर महाराज ने अपने राज्य में फिर से शेर बसाने के लिए पहले गिर से शेर प्राप्त करने का प्रयास किया लेकिन वहां घटती संख्या के कारण से उपलब्ध नहीं हुए बाद में अफ्रीका से शेरों के शावक मंगाए गए इन्हें पालकर श्योपुर जो आज कूनों के आसपास का क्षेत्र है वहां छोड़ा गया लेकिन वनों का कुप्रबंधन, पालतू जानवरों पर हमले और उनके आदमखोर हो जाने के कारण आखिरकार इन्हें मार दिया गया।
पुनः कूनों को शेरों के आवास के रूप में विकसित किया गया तथा 2013 में मध्य प्रदेश की सरकार ने इस दिशा में काफी काम किया एशियाई शेरों के लिए दूसरे सुरक्षित आवास की आवश्यकता 1980 के दशक में महसूस की जाने लगी थी विशेषज्ञो ने चेतावनी दी थी कि यदि पूरी शेर आबादी केवल गिर तक सीमित रहेगी तो किसी महामारी या प्राकृतिक आपदा में पूरी प्रजाति संकट में पढ़ सकती है इसी परिपेक्ष में मध्य प्रदेश के श्योपुर क्षेत्र स्थित कूनो पालपुर अभ्यारण को चुना गया मध्य प्रदेश सरकार ने 1981 में क्षेत्र को संरक्षित अभ्यारण घोषित किया बाद में इसे विस्तारित कर राष्ट्रीय उद्यान के रूप में विकसित किया। इसके लिए 24 गांव को दूसरी जगह बसाया गया कूनो को शेर के दूसरे घर के रूप में विकसित किया गया
1998 में मध्य प्रदेश वन विभाग ने लायन री इंट्रोडक्शन प्रोजेक्ट लागू किया ।
केंद्र तथा मध्य प्रदेश की राज्य सरकारों ने यह हमेशा प्रयास किया कि कूनो में फिर से शेरों को लाकर बसाया जाए लेकिन गुजरात में पुनः मना कर दिया
आखिरकार हार कर यहां अफ्रीका से चीते लाए गए तथा यह क्षेत्र आज चीते से आबाद हो गया।
मध्य प्रदेश आज देश का इकलौता चीता स्टेट बन गया। पर्यटन और सम्मान के साथ प्रदेश में चीते की उपस्थिति ने इस एक कमी को पूरा कर दिया है आज भारत में शेर भी है बाघ भी है तेंदुआ भी है और चीता भी है।
जैसे गुजरात शेर स्टेट है तो मध्य प्रदेश चीता स्टेट हो गया। बाघ तो पूरे देश में हैं ही।
मध्य प्रदेश की यह पहचान गुजरात से देखी नहीं जा रही। मध्यप्रदेश मे अन्य जगहों मे बसाने से पहले गुजरात ने अपने यहां कच्छ के बन्नी घास के मैदान में बसाने की योजना बना ली है इसके लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण तथा चीता प्रोजेक्ट स्टीयरिंग कमेटी ने कूनो नेशनल पार्क से दो नर तथा दो मादा चीतों को स्थानांतरित करने की अनुमति भी दे दी है।
शेरों के रूप में पर्यटन तथा पहचान बनाने वाला गुजरात चीता तो ले रहा है लेकिन शेर नहीं दे रहा है। कूनो नेशनल पार्क शेरों को बसाने के लिए डिजाइन किया गया था। अगर कच्छ के बन्नी घास मैदान चीतो के लिए अफ्रीका के सवाना ग्रासलैंड की ही तरह अनुकूल था तो पहले ही वहां क्यों चीतों को नहीं बसा दिया गया था।
मध्य प्रदेश को शेर ना देना पड़े इसलिए गुजरात का यह षड्यंत्र था कि कूनो में पहले चीता बसा दो जिससे शेर बसाने की संभावना खत्म हो जाए। चीता बसाकर कूनों की शेरों के बसाने की जीवंतता को नष्ट किया गया है।
अब अगर देश में गुजरात के अलावा कहीं शेरों को बसाना है तो पहले वहां अनुकूल स्थिति निर्मित करनी पड़ेगी और ऐसा होने की संभावना कम है और गुजरात को बाहर शेर न भेजना पड़े इसका उसे बहाना मिलता रहेगा ।
कूनो में नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और वोत्सवाना से चीते लाए गए हैं अब इनकी संख्या 53 है। 50 कूनों में तथा तीन गांधी सागर में है नौरादेही में इन्हें बसाने के प्रयास हो रहे थे कि गुजरात पहले कूद पड़ा।
गुजरात के हठ के कारण अभी तक शेर को अन्य जगह बसाने मे सफलता नहीं मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि वन्य जीव राष्ट्रीय संपत्ति है किसी एक राज्य की निजी संपत्ति नहीं है सरकारों को चाहिए कि यह प्रयास अभी भी कर लिया जाए 2013 मे सर्वोच्च न्यायालय ने कूनों मे शेर बसाने का फैसला भी दिया है।
लेकिन समय की मांग को देखते हुए शेर संरक्षण का अगला चरण राष्ट्रीय जिम्मेदारी का होना चाहिए भारत जैसे विशाल और जैव विविधता वाले देश में वन्यजीवों को केवल एक राज्य की पहचान बनाकर नहीं रखना चाहिए जिस प्रकार बाघ कई राज्यों में है गेड़ो को असम के बाहर भी संरक्षित करने का कार्य हो रहा है चीते अन्य क्षेत्र में बसाने की योजना है उसी प्रकार शेरों के लिए वैकल्पिक आवास विकसित होना चाहिए।
इसलिए वन्य जीव संरक्षण का उद्देश्य केवल किसी राज्य की ब्रांडिंग नहीं होना चाहिए यह पूरे देश और आने वाली पीढियो की प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का प्रश्न है गुजरात को एकाधिकार की मानसिकता से ऊपर उठकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए शेर केवल गुजरात के नहीं पूरे भारत की धरोहर हैं। जिस दिन एशियाई शेर सुरक्षित रूप से भारत के विभिन्न उपयुक्त जंगलों में फिर से दहाड़ेंगे उसी दिन वास्तविक अर्थों में उनका संरक्षण सफल माना जाएगा ।
अजय नारायण त्रिपाठी “ अलखू ”
31 मई 2026
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