पृथ्वी दिवस के अवसर पर आदर्श विज्ञान महाविद्यालय रीवा में कार्यक्रम आयोजित हुआ

पृथ्वी दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस आदर्श विज्ञान महाविद्यालय रीवा में कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में विशेष वक्ता के रूप में श्री विमल प्रकाश गौर, उप महानिदेशक, भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग, (उत्तरी क्षेत्र), लखनऊ तथा मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. अतुल तिवारी, विभागाध्यक्ष, पर्यावरणीय जीवविज्ञान उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. रवीन्द्र नाथ तिवारी ने की। अपने संबोधन में प्रो. तिवारी ने कहा कि 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला पृथ्वी दिवस वैश्विक संकट के प्रति चेतना जगाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। वर्ष 2026 की थीम “हमारी शक्ति, हमारा ग्रह” हमें जिम्मेदारी का संदेश देती है। उन्होंने अथर्ववेद के श्लोक के माध्यम से सतत विकास की अवधारणा स्पष्ट करते हुए संसाधनों के संतुलित एवं जिम्मेदार उपयोग पर बल दिया। उन्होंने अथर्ववेद के श्लोक के माध्यम से सतत विकास की अवधारणा समझाते हुए कहा कि संसाधनों का उपयोग संतुलित और पुनर्भरण योग्य होना चाहिए। उन्होंने ‘मिशन लाइफ’ और “गंगा समग्र” जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि पृथ्वी को उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत इकाई मानना आवश्यक है। बढ़ते तापमान, पिघलते ग्लेशियर और समुद्री हीटवेव्स गंभीर खतरे हैं। उन्होंने चेताया कि यदि समय रहते प्रयास नहीं किए गए, तो भविष्य संकटपूर्ण होगा। वायु प्रदूषण की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। यद्यपि भारत के ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ के तहत कुछ सुधार दर्ज किए गए हैं, लेकिन पीएम 2.5 का स्तर अभी भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुरक्षित मानकों से कई गुना अधिक है। 2025 की ‘वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट’ के अनुसार, विश्व के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के शहरों की संख्या अब भी 80 से ऊपर है, जो हमारे स्वास्थ्य ढांचे पर भारी दबाव डाल रही है। भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय उसका गहराता जल संकट है। संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व जल विकास रिपोर्ट 2026’ के अनुमानों के अनुसार, भारत की लगभग 45 प्रतिशत जनसंख्या 2030 तक गंभीर जल संकट की चपेट में होगी। भारत के पास वैश्विक जनसंख्या का 18 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि ताजे जल के संसाधन मात्र 4 प्रतिशत हैं। भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा निष्कर्षक बना हुआ है।

मुख्य वक्ता प्रो. अतुल तिवारी ने अपने व्याख्यान में पर्यावरण संरक्षण के भारतीय सांस्कृतिक दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रकृति को नुकसान पहुँचाना स्वयं को हानि पहुँचाने के समान है। वायु पुराण का उदाहरण देते हुए उन्होंने पौधारोपण को सर्वोत्तम दान बताया। ग्लोबल वार्मिंग को “पृथ्वी का बुखार” बताते हुए उन्होंने इसके गंभीर प्रभावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने सोलर ऊर्जा, किचन गार्डन, जैविक खेती, वृक्षारोपण और पारंपरिक पद्धतियों के महत्व को रेखांकित किया तथा युवाओं को प्रकृति की ओर लौटने का संदेश दिया। वहीं विशेष वक्ता विमल प्रकाश गौर ने अपने संबोधन में “वैश्विक ऊष्मीकरण और हरित ऊर्जा स्रोतों” पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण ऑनलाइन व्याख्यान प्रस्तुत किए। श्री गौर ने वैश्विक ऊष्मीकरण के प्रमुख कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग इस समस्या का मुख्य कारण है। उन्होंने कहा कि अनपेक्षित हीट वेव्स तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे जन-जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और मृत्यु दर में वृद्धि हो रही है। इसके साथ ही मौसम चक्र में असंतुलन देखने को मिल रहा है, जिससे ऋतुओं का समय बदल रहा है। इसका सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है, जिससे फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने “क्रिटिकल मिनरल मिशन” की जानकारी देते हुए बताया कि यह पहल भारत की खनिज आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने, खनिज संसाधनों के अन्वेषण और प्रसंस्करण को बढ़ावा देने तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए महत्वपूर्ण कदम है। कार्यक्रम में पोस्टर प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम में आभार प्रदर्शन डॉ पुष्पेंद्र कुमार तिवारी तथा मंच संचालन डॉ. स्वाति शुक्ला ने किया। इस अवसर पर महाविद्यालय के शिक्षकगण और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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