भ्रष्टाचार स्वीकार करना साहस का कार्य नहीं, उसे रोकना असली साहस है

भ्रष्टाचार स्वीकार करना साहस का कार्य नहीं, उसे रोकना असली साहस है


21 जनवरी को मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कलेक्टर-एसपी की बैठक में जिलों के प्रशासनिक कामकाज की समीक्षा की। इसी दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का हवाला देते हुए कहा कि “कलेक्टर बिना पैसा लिए काम नहीं करते।”
यह कथन सिर्फ़ एक टिप्पणी नहीं था, बल्कि प्रदेश की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के चरित्र पर सवाल खड़ा करने वाला वक्तव्य था। जब मुख्यमंत्री के नाम पर यह बात कही जाती है, तो यह माना जाएगा कि यह मुख्यमंत्री के अनुभव और शासन की वास्तविकता से उपजा हुआ कथन है।
पुलिस विभाग की लापरवाही, अधिकारियों का फोन न उठाना, कार्यालयों से नदारद रहना—ये सब बातें उसी बैठक में सामने आईं मुख्य सचिव ने स्वयं देखा। यह दर्शाता है कि सरकार और अपराधियों के बीच अंतर अब सिर्फ़ इतना रह गया है कि प्रदेश के संसाधनों का दोहन कौन करेगा।
अगर सरकार को राजस्व मिलता है, तो उसे “सुशासन” कहा जाता है;
अगर वही पैसा विरोधी या स्वतंत्र अपराधी कमा ले, तो वह सरकार के लिए “अपराध” बन जाता है।
भाजपा सरकार से जनता को ईमानदार और पारदर्शी शासन की उम्मीद थी, लेकिन भ्रष्टाचार अब ऐसा कारक बन चुका है जिसने सरकार की लोकप्रियता को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाया है—चाहे वह केंद्र हो या राज्य।
मुख्यमंत्री का यह कहना कि “कोई भी कलेक्टर बिना पैसा लिए काम नहीं करता”—यह बात केवल उनका अनुभव नहीं, बल्कि जनता के अनुभव और मेरे अपने अनुभव से भी मेल खाती है। लेकिन केवल स्वीकार कर लेना साहस नहीं है।
सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ कलेक्टर ही पैसा लेते हैं?
उनके ऊपर संबंधित मंत्री, विभागीय संरक्षण और अंततः राजनीतिक नेतृत्व तक यह रकम पहुँचती है—यह किसी से छिपा नहीं है।
राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा का यह स्वीकार करना कि “थोड़ा-बहुत चलता है, तहसीलदार लेते हैं, कलेक्टर बचाते हैं”—यह भ्रष्टाचार का औपचारिक वैधीकरण है। यह “थोड़ा-बहुत” नहीं, बल्कि बहुत बड़ा संस्थागत भ्रष्टाचार है।
आज भाजपा में बड़ी संख्या में कांग्रेस और अन्य दलों से आए लोग शामिल हो चुके हैं। परिणाम यह है कि मूल भाजपा कार्यकर्ता हाशिये पर है और पैसे का प्रबंध करने वाले लोग पोस्टर बॉय बने बैठे हैं।
जो कार्यकर्ता वर्षों से पार्टी की सेवा करता रहा, वह सोचता है कि उसका काम निःशुल्क होगा—लेकिन प्राथमिकता उसे मिलती है जिसके पास “माल” होता है।
आज भाजपा उस स्थिति में पहुँच गई है जहाँ वह कांग्रेस को भ्रष्टाचार पर घेरने का नैतिक अधिकार खोती जा रही है। जिन अधिकारियों को कभी कांग्रेस शासन में भ्रष्टाचार के लिए बदनाम माना जाता था, वे आज मंत्रियों-विधायकों के साथ मंच साझा कर रहे हैं, सम्मान पा रहे हैं और संगठन में दायित्व निभा रहे हैं।
किसी भी नेता का चरित्र उसके आसपास मौजूद लोगों से भी पहचाना जाता है।
अगर सबसे बेईमान अधिकारी  या मंत्री विधायक का स्टाफ, आपका सबसे प्रिय और सम्मानित व्यक्ति है,
अगर वही सबसे ज़्यादा सुना जाता है,
तो आपकी ईमानदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
किसी मुख्यमंत्री द्वारा अपने भ्रष्टाचार को स्वीकार करना साहस हो सकता है—
लेकिन असली साहस उसे रोकना है, न कि उसे सामान्य बताना।

अजय नारायण त्रिपाठी  “ अलखू ”

09 फरवरी 2026

Facebook Comments Box

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *