भगवान शिव का अद्भुत उग्र रूप है काल भैरवनाथ बाबा
अद्भुत शयन मुद्रा में सबसे बड़ी प्रतिमाओं में एक है भैरवनाथ

रीवा 30 जनवरी 2026. विन्ध्य क्षेत्र प्राचीन मंदिरों से भरा हुआ क्षेत्र है। विन्ध्य और बुंदेलखण्ड के अलग-अलग भागों में शैव कालीन, राजपूत कालीन, कल्चुरि कालीन स्थापत्य का प्रतिनिधित्व करते हुए कई शैव और जैन मंदिर हैं। प्राचीनतम शिव मंदिर भी इन्ही क्षेत्रों में स्थित हैं। विन्ध्य की धरा प्राचीन स्तूपों, मंदिरों, मठों और प्रतिमाओं से समृद्ध है। प्राचीन मूर्तिकला का अद्भुत प्रमाण गुढ़ के समीप खामडीह गांव में स्थित भैरवनाथ बाबा की प्रतिमा है। यह प्रतिमा भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव की देश की सबसे बड़ी प्रतिमाओं में से एक है। अद्भुत शयन मुद्रा में इस प्रतिमा का सौंदर्य निराला दिखाई देता है। प्रतिमा की लम्बाई 8.5 मीटर तथा चौड़ाई 3.7 मीटर है। यह प्रतिमा वर्षों से विन्ध्य की प्रमुख कैमोर पर्वत माला की गोद में खुले में थी। इस पर शासन की एलएडी योजना से दो मंजिला भव्य मंदिर बनाया गया है। मंदिर के साथ-साथ सामुदायिक भवन, आठ दुकानें एवं अन्य निर्माण कार्य किए गए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 31 जनवरी को भव्य समारोह में इस मंदिर का लोकार्पण करेंगे।
भैरवनाथ की विशाल प्रतिमा का निर्माण संभवत: 10वीं से 11वीं शताब्दी के मध्य कल्चुरि काल में कराया गया। शयन मुद्रा में यह प्रतिमा एक ही पत्थर को तराशकर बनाई गई है। काले रंग के बलुआ पत्थर से निर्मित यह मूर्ति अद्भुत है। भैरवनाथ के चेहरे पर रौद्र रूप होते हुए भी असीम शांति का भाव है। यह प्रतिमा चतुर्भुज रूप में अंकित है। प्रतिमा के दाहिने हाथ में सृष्टि के पालन और संहार का प्रतीक त्रिशूल है। प्रतिमा के निचले दाहिने हाथ में ध्यान और भक्ति का प्रतीक रूद्राक्ष माला है। प्रतिमा के ऊपरी बायें हाथ में तीन शीषों वाले सर्प लिपटे हुए है जो त्रिशक्ति का प्रतीक हैं। भैरव प्रतिमा के बायें हाथ में बीज और फल हैं। ये दोनों उर्वरता और सृजन शक्ति का प्रतीक हैं। इस आकर्षक और भव्य प्रतिमा के शीष पर भव्य मुकुट सुशोभित है। भैरवनाथ कुंडल, अनेक हार और यज्ञोपवीत से अलंकृत हैं। प्रतिमा को चार परिचारिकायें घेरे हुए हैं। इनमें से दो बैठी तथा दो खड़ी मुद्रा में हैं। यह प्रतिमा हजारों लोगों के आस्था का केन्द्र है। रोग निवारण, भय दूर करने और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने के लिए यहाँ लोग पूजा करने आते हैं। मंदिर के चारों ओर पथरीला ढालू क्षेत्र है। इस मंदिर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

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